Common Ground

यह पहल क्यों ज़रूरी

आज हमारे सामने जलवायु परिवर्तन, ग्रामीण संकट और बढ़ती असमानता जैसी गंभीर समस्याएं हैं. ये समस्याएं बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं, जो बड़ी चिंता का विषय है. सरकारी प्रयास, निजी क्षेत्र के प्रोत्साहन, ज़मीनी स्तर तक तकनीक की पहुँच और सामाजिक संगठनों का प्रभाव - इन सबके द्वारा अपने-अपने स्तर पर कोशिशें हो रही हैं. लेकिन, ज़रूरी बदलाव लाने के लिए इनमें से कोई भी अकेला काफी नहीं है.

हमें प्रकृति और लोगों, दोनों को मजबूत करने की सख्त ज़रूरत है. एक तरफ हमें यह प्रयास करना चाहिए कि प्रकृति फिर से स्वस्थ और जीवंत बने. दूसरी तरफ, हमें लोगों के निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना है—विशेषकर महिलाओं, आदिवासियों और गांव के कमज़ोर लोगों की—ताकि वे अपनी ज़मीन वापस पा सकें, अपना भविष्य खुद तय कर सकें और अपनी कहानी खुद लिख सकें.

कॉमन ग्राउंड सामाजिक संस्थाओं, कंपनियों और सरकार के लोगों को प्रेरित कर रहा है और उन्हें एक मंच पर ला रहा है. इसके ज़रिए वह ऐसे नए संबंध, काम करने की प्रक्रियाएं और जानकारी और सूचना का तंत्र तैयार करेगा जो स्थानीय समुदायों के लिए अपना भविष्य खुद तय करने के लिए ज़रूरी हैं.

भारत के कॉमन्स (सांझा संसाधन) हर साल 4% की दर से घट रहे हैं, जिससे वन निवासियों, पशुपालकों, आदिवासी समुदायों और महिलाओं की आजीविका खतरे में पड़ गई है.

भारत के कॉमन्स (सांझा संसाधन) हर साल 4% की दर से घट रहे हैं, जिससे वन निवासियों, पशुपालकों, आदिवासी समुदायों और महिलाओं की आजीविका खतरे में पड़ गई है. जैसे-जैसे भोजन, पानी और ईंधन तक पहुंच कम होती जा रही है और आय घट रही है, असमानता गहरी हो रही है और जलवायु से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं. स्थानीय स्तर पर खुद को संचालित करने वाले हमारे परंपरिक रीति रिवाज अब खत्म हो रहे हैं. 

ये रीति रिवाज पारिस्थितिक संतुलन और लोकतांत्रिक तरीकों पर आधारित थे. हमें इन रीति रिवाजों को फिर से मजबूत करना होगा. ऐसा करना न केवल हमारे पुनर्निर्माण, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में नए संस्थागत बदलाव लाने के लिए भी ज़रूरी है.

आश्रित आबादी

भारत में 35 करोड़ से अधिक ग्रामीण गरीब अपनी आजीविका के लिए साझा संपत्ति संसाधनों पर निर्भर हैं।

आर्थिक मूल्य

कॉमन्स से गरीब ग्रामीण परिवारों को सालाना लगभग 90.5 अरब अमेरिकी डॉलर (6.6 लाख करोड़ रुपये) की आय होती है.

क्षेत्रफल

भारत में लगभग 20.5 करोड़ एकड़ में कॉमन्स मौजूद हैं.

स्वशासन

कॉमन्स का प्रबंधन स्व-नियामक स्थानीय संस्थाओं जैसे ग्राम पंचायतों, एफआरए समितियों, वन सुरक्षा समितियों और ग्राम सभाओं के माध्यम से किया जाता है, जो सामूहिक सामुदायिक निर्णय लेने में सक्षम बनाते हैं।

बाधाओं को समझना

गहरी जड़ें जमाए संरचनात्मक अवरोध, टॉप-डाउन दृष्टिकोण और लम्बे समय से मौजूद पूर्वाग्रह से विकास परिदृश्य प्रभावित होता है जो महिलाओं को हाशिए पर डालते हैं, स्थानीय प्राथमिकताओं की अनदेखी करते हैं और पारिस्थितिकी संबंधी ज़रूरतों की अहमियत कम करते हैं (देखें समस्या वृक्ष). सरकारी क्षमता, निजी क्षेत्र के प्रोत्साहन, फर्स्ट माइल तक तकनीकी पहुँच और नागरिक समाज का प्रभाव; ये सभी आवश्यक बदलाव के लिए पूरी तरह प्रेरित नहीं कर पाते हैं, खासकर किरदारों के बीच पूर्ण सहमति के अभाव में ऐसा होता है.

कॉमन ग्राउंड विविध दृष्टिकोणों के बीच सहयोग, सह-निर्माण और विश्वास निर्माण के जरिए पारिस्थितिकी तंत्र की सामूहिक कार्यक्षमता को मजबूत करता है.

चुनौती

कॉमन्स और ग्रामीण विकास के बीच के स्पष्ट संबंधों के बावजूद, विकास योजनाएं तैयार करने में पारिस्थितिक और सामुदायिक प्राथमिकताओं को लगातार दरकिनार किया जा रहा है.

भारत जलवायु, ग्रामीण आजीविका और समानता से संबंधित तिहरे संकट का सामना कर रहा है, जो चुनौती कोविड-19 महामारी के बाद से और भी गहरा गई है. इन चुनौतियों से निपटने में विफल रहना हम सभी के लिए एक ख़तरा है.

आर्थिक विकास की हमारी दौड़ में पारिस्थितिकी की चिंताओं और स्थानीय प्राथमिकताओं - विशेष रूप से महिलाओं और हाशिए के समुदायों की प्राथमिकताओं - को दरकिनार कर दिया जाता है.

सामूहिक रूप से साझा किए जाने वाले संसाधनों को कानून द्वारा उस तरह संरक्षित नहीं किया जाता है जैसे कि निजी या राज्य के स्वामित्व वाली संपत्ति का किया जाता है.

कई लोग अभी भी संसाधनों के प्रशासन और प्रबंधन की ग्रामीण लोगों, विशेषकर महिलाओं की क्षमता पर सवाल उठाते हैं.

सामाजिक संगठनों, सरकार और बाजारों की कोशिशें अलग-अलग और बिखरे हुए रहते हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि इनके काम और उद्देश्य एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं.

सरकार की क्षमता, कॉर्पोरेट प्रोत्साहन, डिजिटल पहुंच और सामाजिक संगठनों के प्रयास अपने आप में ज़मीनी स्तर पर स्थायी बदलाव लाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए हैं.

गहरे बदलाव की ज़रूरत

जलवायु, आजीविका और समानता संबंधी संकटों की मौज़ूदगी के कारण एक ऐसे समेकित दृष्टिकोण की तत्काल ज़रूरत है जो इन तीनों से संबंधित चुनौतियों को हल कर सके.

व्यवस्थागत परिवर्तन के लिए आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ सामूहिक कार्रवाई हेतु सामाजिक ढाँचा की ज़रूरी होता है.

सरकारी क्षमता, निजी क्षेत्र के प्रोत्साहन, 'फर्स्ट माइल' तक तकनीकी पहुँच और नागरिक समाज का प्रभाव, ये सभी आवश्यक गति और पैमाने पर परिवर्तन नहीं ला सकते हैं। हमें एक ऐसे 'पारिस्थितिक दृष्टिकोण' की ज़रूरत है जो पूर्ण सहमति के बिना भी, ग्रामीण आजीविका, समानता और पर्यावरण प्रबंधन की परस्पर जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने और व्यापक व्यवस्थागत परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए विविध हितधारकों को वैचारिक समानता के साथ एक मंच पर लाए.